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श्री खाटू श्याम जी कौन हैं, खाटू श्याम जी की कहानी

राजस्थान के सीकर जिले में श्री खाटू श्याम जी का सुप्रसिद्ध मंदिर है। वैसे तो खाटू श्याम बाबा के भक्तों की कोई गिनती नहीं लेकिन इनमें खासकर वैश्य, मारवाड़ी जैसे व्यवसायी वर्ग अधिक संख्या में है। Shyam Baba कौन थे, उनके जन्म और जीवन चरित्र के बारे में जानते हैं इस लेख में।

खाटू श्याम बाबा कौन हैं | Who is Khatu Shyam Ji in hindi

खाटू श्याम जी का असली नाम बर्बरीक है। खाटू श्याम बाबा घटोत्कच और नागकन्या मौरवी के पुत्र हैं। पांचों पांडवों में सर्वाधिक बलशाली भीम और उनकी पत्नी हिडिम्बा बर्बरीक के दादा दादी थे।

श्री खाटू श्याम जी कौन हैं, खाटू श्याम जी की कहानी |...
श्री खाटू श्याम जी कौन हैं, खाटू श्याम जी की कहानी |…

कहा जाता है कि जन्म के समय बर्बरीक के बाल बब्बर शेर के समान थे, अतः उनका नाम बर्बरीक रखा गया। महाभारत की एक कहानी के अनुसार बर्बरीक का सिर राजस्थान प्रदेश के खाटू नगर में दफना दिया गया था। इसीलिए बर्बरीक जी का नाम खाटू श्याम बाबा के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

बर्बरीक का नाम श्याम बाबा (Shyam Baba) कैसे पड़ा, आइये इसकी कहानी जानते हैं।

खाटू श्याम जी की कहानी | Khatu Shyam story in hindi

बर्बरीक बचपन में एक वीर और तेजस्वी बालक थे। बर्बरीक ने भगवान श्री कृष्ण और अपनी माँ मौरवी से युद्धकला, कौशल सीखकर निपुणता प्राप्त कर ली थी।

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श्री खाटू श्याम बाबा जी

बर्बरीक ने भगवान शिव की घोर तपस्या की थी, जिसके आशीर्वादस्वरुप भगवान ने शिव ने बर्बरीक को 3 चमत्कारी बाण प्रदान किए। इसी कारणवश बर्बरीक का नाम तीन बाणधारी के रूप में भी प्रसिद्ध है। भगवान अग्निदेव ने बर्बरीक को एक दिव्य धनुष दिया था, जिससे वो तीनों लोकों पर विजय प्राप्त करने में समर्थ थे।

जब कौरवों-पांडवों का युद्ध होने का सूचना बर्बरीक को मिली तो उन्होंने भी युद्ध में भाग लेने का निर्णय लिया। बर्बरीक ने अपनी माँ का आशीर्वाद लिया और युद्ध में हारते हुए पक्ष का साथ देने का वचन देकर निकल पड़े। इसी वचन के कारण हारे का सहारा बाबा श्याम हमारा यह बात प्रसिद्ध हुई।

जब बर्बरीक जा रहे थे तो उन्हें मार्ग में एक ब्राह्मण मिला। यह ब्राह्मण कोई और नहीं, भगवान श्री कृष्ण थे जोकि बर्बरीक की परीक्षा लेना चाहते थे। ब्राह्मण बने श्री कृष्ण ने बर्बरीक से प्रश्न किया कि वो मात्र 3 बाण लेकर लड़ने को जा रहा है ? मात्र 3 बाण से कोई युद्ध कैसे लड़ सकता है।

बर्बरीक ने कहा कि उनका एक ही बाण शत्रु सेना को समाप्त करने में सक्षम है और इसके बाद भी वह तीर नष्ट न होकर वापस उनके तरकश में आ जायेगा। अतः अगर तीनों तीर के उपयोग से तो सम्पूर्ण जगत का विनाश किया जा सकता है।

ब्राह्मण ने बर्बरीक (Barbarik) से एक पीपल के वृक्ष की ओर इशारा करके कहा कि वो एक बाण से पेड़ के सारे पत्तों को भेदकर दिखाए। बर्बरीक ने भगवान का ध्यान कर एक बाण छोड़ दिया। उस बाण ने पीपल के सारे पत्तों को छेद दिया और उसके बाद बाण ब्राह्मण बने कृष्ण के पैर के चारों तरफ घूमने लगा।

असल में कृष्ण ने एक पत्ता अपने पैर के नीचे छिपा दिया था। बर्बरीक समझ गये कि तीर उसी पत्ते को भेदने के लिए ब्राह्मण के पैर के चक्कर लगा रहा है। बर्बरीक बोले – हे ब्राह्मण अपना पैर हटा लो, नहीं तो ये आपके पैर को वेध देगा।

श्री कृष्ण बर्बरीक के पराक्रम से प्रसन्न हुए। उन्होंने पूंछा कि बर्बरीक किस पक्ष की तरफ से युद्ध करेंगे. बर्बरीक बोले कि उन्होंने लड़ने के लिए कोई पक्ष निर्धारित किया है, वो तो बस अपने वचन अनुसार हारे हुए पक्ष की ओर से लड़ेंगे। श्री कृष्ण ये सुनकर विचारमग्न हो गये क्योकि बर्बरीक के इस वचन के बारे में कौरव जानते थे।

कौरवों ने योजना बनाई थी कि युद्ध के पहले दिन वो कम सेना के साथ युद्ध करेंगे। इससे कौरव युद्ध में हराने लगेंगे, जिसके कारण बर्बरीक कौरवों की तरफ से लड़ने आ जायेंगे। अगर बर्बरीक कौरवों की तरफ से लड़ेंगे तो उनके चमत्कारी बाण पांडवों का नाश कर देंगे।

कौरवों की योजना विफल करने के लिए ब्राह्मण बने कृष्ण ने बर्बरीक से एक दान देने का वचन माँगा। बर्बरीक ने दान देने का वचन दे दिया। अब ब्राह्मण ने बर्बरीक से कहा कि उसे दान में बर्बरीक का सिर चाहिए.

इस अनोखे दान की मांग सुनकर बर्बरीक आश्चर्यचकित हुए और समझ गये कि यह ब्राह्मण कोई सामान्य व्यक्ति नहीं है।  बर्बरीक ने प्रार्थना कि वो दिए गये वचन अनुसार अपने शीश का दान अवश्य करेंगे, लेकिन पहले ब्राह्मणदेव अपने वास्तविक रूप में प्रकट हों।

भगवान कृष्ण अपने असली रूप में प्रकट हुए। बर्बरीक बोले कि हे देव मैं अपना शीश देने के लिए बचनबद्ध हूँ लेकिन मेरी युद्ध अपनी आँखों से देखने की इच्छा है। श्री कृष्ण बर्बरीक ने बर्बरीक की वचनबद्धता से प्रसन्न होकर उसकी इच्छा पूरी करने का आशीर्वाद दिया। बर्बरीक ने अपना शीश काटकर कृष्ण को दे दिया।

श्री कृष्ण ने बर्बरीक के सिर को 14 देवियों के द्वारा अमृत से सींचकर युद्धभूमि के पास एक पहाड़ी पर स्थित कर दिया, जहाँ से बर्बरीक युद्ध का दृश्य देख सकें। इसके पश्चात कृष्ण ने बर्बरीक के धड़ का शास्त्रोक्त विधि से अंतिम संस्कार कर दिया।

महाभारत का महान युद्ध समाप्त हुआ और पांडव विजयी हुए। विजय के बाद पांडवों में यह बहस होने लगी कि इस विजय का श्रेय किस योद्धा को जाता है। श्री कृष्ण ने कहा – चूंकि बर्बरीक इस युद्ध के साक्षी रहे हैं अतः इस प्रश्न का उत्तर उन्ही से जानना चाहिए।

तब परमवीर बर्बरीक ने कहा कि इस युद्ध की विजय का श्रेय एकमात्र श्री कृष्ण को जाता है, क्योकि यह सब कुछ श्री कृष्ण की उत्कृष्ट युद्धनीति के कारण ही सम्भव हुआ। विजय के पीछे सबकुछ श्री कृष्ण की ही माया थी।

बर्बरीक के इस सत्य वचन से देवताओं ने बर्बरीक पर पुष्पों की वर्षा की और उनके गुणगान गाने लगे। श्री कृष्ण वीर बर्बरीक की महानता से अति प्रसन्न हुए और उन्होंने कहा  हे वीर बर्बरीक आप महान है। मेरे आशीर्वाद स्वरुप आज से आप मेरे नाम श्याम से प्रसिद्ध होओगे। कलियुग में आप कृष्णअवतार रूप में पूजे जायेंगे और अपने भक्तों के मनोरथ पूर्ण करेंगे।

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पढ़ें > खाटू श्याम जी की पूजा कैसे करें, श्याम जी की आरती

भगवान श्री कृष्ण का वचन सिद्ध हुआ और आज हम देखते भी हैं कि भगवान श्री खाटू श्याम बाबा जी अपने भक्तों पर निरंतर अपनी कृपा बनाये रखते हैं। बाबा श्याम अपने वचन अनुसार हारे का सहारा बनते हैं। इसीलिए जो सारी दुनिया से हारा-सताया गया होता है, वो अगर सच्चे मन से बाबा श्याम के नामों का जप, स्मरण करे तो उसका कल्याण अवश्य ही होता है।

Q: खाटू श्याम किसका अवतार है ?

A: खाटू श्याम जी कलियुग में श्री कृष्ण भगवान के अवतार के रूप में माने जाते हैं।

Q: खाटू श्याम धाम कहां पर है ?

A: खाटूधाम सीकर जिला, राजस्थान में है।

Q: खाटू श्याम मंदिर खुलने व दर्शन का समय ?

A: गर्मी के मौसम में प्रातः 4:00 बजे से दोपहर 12:30 बजे तक, सायं 04:00 से रात 10:00 तक और ठंड के मौसम में प्रातः 05:30 बजे से दोपहर 1:00 बजे तक, सांय 5:00 बजे से रात्रि 9:00 तक ।

Q: खाटू श्याम मंदिर जाने के लिए ट्रेन व स्टेशन

A: खाटू श्याम मंदिर से निकटतम रेलवे स्टेशन रींगस (Ringas) जंक्शन है। जयपुर से रींगस रेलवे स्टेशन तक ट्रेन जाती है। ट्रेन के सफर में लगभग डेढ़ घंटा लगता है और ट्रेनें ज्यादातर समय पर उपलब्ध होती हैं। जयपुर से लगभग 7 ट्रेनें हैं जो जयपुर रेल्वे स्टेशन से 05:05, 12:40, 18:05, 20:40, 13:25 पर प्रस्थान करती है।

श्री खाटू श्याम बाबा (Shri Khatu Shyam Baba ji) की महिमा अपरम्पार है। सश्रद्धा विनती है कि बाबा श्याम इसी प्रकार अपने भक्तों पर अपनी कृपा बनाये रखें। खाटू श्याम जी कहानी को Whatsapp, Facebook पर यह लेख अच्छा लगा तो शेयर और फ़ॉरवर्ड जरुर करें, जिससे अन्य लोग भी ये जानकारी पढ़ सकें।

कौन हैं खाटू श्याम और महाभारत से क्या है कनेक्शन, जानें कैसे बने थे पांडवों की जीत की वजह

राजस्थान के सीकर जिले में स्थित खाटू श्याम मंदिर में सोमवार सुबह अचानक भगदड़ मच गई। इस हादसे में अब तक 3 महिलाओं की मौत हो गई, जबकि 4 लोग घायल हैं। आखिर क्यों इतना प्रसिद्ध है खाटू श्याम मंदिर और महाभारत से इसका क्या है कनेक्शन। आइए जानते हैं।

Khatu Shyam: राजस्थान के सीकर जिले में स्थित खाटू श्याम मंदिर में सोमवार सुबह अचानक भगदड़ मच गई। इस हादसे में अब तक 3 महिलाओं की मौत हो गई, जबकि 4 लोग घायल हैं। हादसा सोमवार तड़के 5 बजे उस वक्त हुआ, जब एकादशी के मौके पर दर्शन करने आए श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ पड़ा। मंदिर का पट खुलते ही भगदड़ मच गई, जिसमें कई लोग कुचल गए। आखिर क्यों इतना प्रसिद्ध है खाटू श्याम मंदिर और महाभारत से इसका क्या है कनेक्शन, आइए जानते हैं।

भगवान कृष्ण के कलियुगी अवतार हैं खाटू श्याम : 
बाबा खाटू श्याम को भगवान कृष्ण का कलियुगी अवतार कहा जाता है। दरअसल, महाभारत काल में भीम के पौत्र थे, जिनका नाम बर्बरीक था। यही बर्बरीक अब खाटू श्याम हैं। श्री कृष्ण ने स्वयं बर्बरीक को कलियुग में खाटू श्याम के नाम से पूजे जाने का वरदान दिया था।

भीम के पोते हैं बर्बरीक : 
दरअसल, महाभारत में जब कौरवों ने लाक्षागृह में आग लगवा दी तो पांडव वहां से अपनी जान बचाकर भागे। इस दौरान वो वन-वन भटकते रहे। वन में ही भीम की मुलाकात हिडिंबा नाम की राक्षसी से हुआ। हिडिंबा ने भीम को देखते ही उन्हें मन ही मन में अपना पति स्वीकार कर लिया। बाद में हिडिंबा कुंती से मिली और भीम के साथ उनका विवाह हो गया। हिडिम्बा और भीम के एक पुत्र हुआ, जिसका नाम घटोत्कच था। इन्हीं घटोत्कच का पुत्र का नाम बर्बरीक है, जो ताकत में अपने पिता से भी ज्यादा मायावी था।

हमेशा हारने वाले पक्ष की मदद करते थे बर्बरीक : 
बर्बरीक ने तपस्या के बल पर देवी से तीन बाण प्राप्त किए। इनकी खासियत ये थी कि जब तक ये अपने लक्ष्य को भेद न दें तब तक उसके पीछे पड़े रहते थे। लक्ष्य भेदने के बाद ये तुणीर में लौट आते थे। इन बाणों की शक्ति से बर्बरीक अजेय हो गया। महाभारत में जब कौरव-पांडवों में युद्ध चल रहा था तो बर्बरीक कुरुक्षेत्र की तरफ आ रहा था। बर्बरीक हमेशा हारने वाले पक्ष की मदद करते थे और यद्ध में कौरव हार की तरफ बढ़ रहे थे। ऐसे में श्रीकृष्ण ने सोचा कि अगर बर्बरीक युद्ध में शामिल हुआ तो ठीक नहीं होगा। बर्बरीक को रोकने के भगवान कृष्ण ने ब्राह्मण का रूप धरा और उसके सामने पहुंच गए।

कृष्ण ने बर्बरीक को रोक कर ली उनकी परीक्षा : 
इसके बाद कृष्ण ने बर्बरीक से पूछा कि तुम कौन हो और कुरुक्षेत्र क्यों जा रहे हो। इस पर बर्बरीक ने कहा कि वो हारने वाले पक्ष का साथ देंगे और अपने एक ही बाण से महाभारत का युद्ध खत्म कर देंगे। इस पर कृष्ण ने उसकी परीक्षा लेनी चाही और कहा- अगर तुम श्रेष्ठ धनुर्धर हो तो सामने खड़े पीपल के पेड़ के सारे पत्ते एक ही तीर में गिराकर दिखाओ। बर्बरीक भगवान की बातों में आ गए और तीर चला दिया, जिससे कुछ क्षणों में सभी पत्ते गिर गए और तीर श्रीकृष्ण के पैरों के पास चक्कर लगाने लगा। दरअसल, कृष्ण ने एक पत्ता चुपके से अपने पैर के नीचे दबा लिया था। इस पर बर्बरीक ने कहा- आप अपना पैर हटा लें, ताकि तीर उस पत्ते को भी भेद सके।

कृष्ण ने बर्बरीक से मांग लिया उनका सिर : 
इसके बाद श्रीकृष्ण ने बर्बरीक से कहा कि तुम तो बड़े शक्तिशाली हो। क्या मुझ ब्राह्मण को कुछ दान नहीं दोगे। इस बर्बरीक ने कहा- आप जो चाहें मांग लें। श्रीकृष्ण ने बर्बरीक से उसका सिर मांग लिया। इस पर बर्बरीक समझ गए कि ये कोई साधारण ब्राह्मण नहीं है। इसके बाद श्रीकृष्ण अपने वास्तविक स्वरूप में आए तो बर्बरीक ने उन्हें अपना सिर काटकर भेंट कर दिया।

बर्बरीक को दिया कृष्ण रूप में पूजे जाने का वरदान : 
इसके बाद भगवान कृष्ण ने बर्बरीक से अपनी कोई इच्छा बतलाने को कहा। तब बर्बरीक ने कहा कि वो कटे हुए सिर के साथ ही महाभारत का पूरा युद्ध देखना चाहते हैं। श्रीकृष्ण ने उनकी इच्छा पूरी की और बर्बरीक का सिर पास की ही एक पहाड़ी, जिसे खाटू कहा जाता था वहां स्थापित हो गया। यहीं से बर्बरीक ने पूरा युद्ध देखा। कृष्ण ने बर्बरीक को वरदान दिया कि वो कलियुग में मेरे ही एक नाम यानी श्याम से पूजे जाएंगे। वो हारे का सहारा बनेंगे।

कौन हैं बाबा खाटू श्याम, जानिए खाटूश्यामजी का इतिहास

खाटू मेला 2018 के मौके पर जानिए राजस्थान के सीकर जिले के गांव खाटू के नरेश खाटूश्यामजी को पूरी दुनिया में शीश के दानी के नाम से भी क्यों जाना जाता है?

खाटूश्यामजी (सीकर). बाबा श्याम। हारे का सहारा। लखदातार। खाटूश्यामजी। नीले घोड़े का सवार। मोर्विनंदन। खाटू नरेश और शीश का दानी। जितने निराले बाबा श्याम के नाम और भक्त हैं। उतना ही रोचक इनका इतिहास है। खाटू मेला 2018 के मौके पर जानिए राजस्थान के सीकर जिले के गांव खाटू के नरेश खाटूश्यामजी को पूरी दुनिया में शीश के दानी के नाम से भी क्यों जाना जाता है?। कौन हैं खाटूश्यामजी। कैसे बने बाबा श्याम। इन सबके पीछे कौनसी पौराणिक कथा है?।

खाटूश्यामजी की कथा

-कौरव वंश के राजा दुर्योधन नेनिर्दोष पाण्डवों को सताने और उन्हें मारने के लिए लाक्षागृह का निर्माण किया था, पर सौभाग्यवश वे उसमें से बच निकले और वनवास में रहने लगे।
-एक समय जब वे वन में सो रहे थे उस स्थान के पास ही एक हिडम्ब नामक राक्षस अपनी बहन हिडिम्बी सहित रहता था। तब उनको मनुष्य (पाण्डवों) की गंध आई तो उन्हें देखकर यह राक्षस अपनी ***** से बोला इन मनुष्यों को मारकर मेरे पास ले आओ।
-अपने भाई के आदेश से वह वहां आई जहां पास ही सभी भाई द्रोपदी सहित सो रहे थे। और भीम उनकी रक्षा में जग रहा था। भीम के स्वरूप को देखकर हिडिम्बी उस पर मोहित हो और मन में यह सोचने लगी मेरे लिए उपयुक्त पति यही हो सकता है।
-उसने भाई की परवाह किए बिना भीम को पति मान लिया। कुछ देर बाद हिडिम्बी के वापस न लौटने पर हिडिम्बासुर वहां आया और स्त्री के सुन्दर भेष में अपनी ***** को भीम से बात करता देख क्रोधित हुआ।
-तत्पश्चात हिडिम्बी के अनुनय विनय से माता कुन्ती व युधिष्ठिïर के निर्णय से दोनों का गन्धर्व विवाह हुआ। उपरोक्त अवधि के अन्तर्गत हिडिम्बी गर्भवती हुई और एक महाबलवान पुत्र को जन्म दिया। बाल रहित होने से बालक का नाम घटोत्कच रखा गया।
-हिडिम्बा ने कहा कि मेरा भीम के साथ रहने का समय समाप्त हो गया है और आवश्यकता होने पर पुन: मिलने के लिए कह वह अपने अभिष्ठï स्थान पर चली गई। साथ ही घटोत्कच भी सभी को प्रणाम कर आज्ञा लेकर उतर दिशा की और चला गया।
-जल्द ही कृष्ण के कहने पर मणिपुर में मुरदेत्य की लडक़ी कामकंटका से गन्धर्व विवाह हुआ व कुछ समय व्यतीत होने के पश्चात उन्हें महान पराक्रमी पुत्र को जन्म दिया जिसके शेर की भांति सुन्दर केशों को देखकर उसका नाम बर्बरीक रखा।
-बल की प्राप्ति के लिए उसने देवियों की निरन्तर आराधना कर तीनों लोको में किसी में ऐसा दुर्लभ अतुलनीय बल का वरदान पाया। देवियों ने बर्बरीक को कुछ समय वहीं निवास करने के लिए कहा और कहा कि एक विजय नामक ब्राह्मïण आएंगे। उनके संग में तुम्हारा और अधिक कल्याण होगा।
-आज्ञानुसार बर्बरीक वहां रहने लगा। तब मगध देश के विजयी नामक ब्राह्मïण वहां आये और सात शिव्लिंगों की पूजा की साथ ही विद्या की सफलता के लिए देवियों की पूजा की। ब्राह्मïण को स्वप्न में आकर कहा कि सिद्घ माता के सामने आंगन में साधना करो बर्बरीक तुम्हारी सहायता करेगा।
-ब्राह्मïण के आदेश से बर्बरीक ने साधना में विघ्न डालने वाले सभी राक्षसों को यमलोक भेज दिया। उन असुरों को मारने पर नागों के राजा वांसुकि वहां आए और बर्बरीक को दान मांगने के लिये कहा।
-तब बर्बरीक ने विजय की निर्विघ्न तपस्या सफल हो यही वर मांगा। ब्राह्मïण की तपस्या सफल होने पर उसने बर्बरीक को युद्घ में विजयी होने का वरदान दिया। तत्पश्चात विजय को देवताओं ने सिद्घश्चर्य प्रदान किया तब से उनका नाम सिद्घसेन हो गया।
-कुछ काल बीत जाने के बाद कुरूक्षेत्र मैदान में कौरवों और पाण्डवों के बीच में युद्घ की तैयारियां होने लगी। इस अवसर पर बर्बरीक भी अपने तेज नीले घोड़े पर सवार होकर आ रहे थे।
-तब रास्ते में ही भगवान श्री कृष्ण ने बर्बरीक की परीक्षा लेने के लिए ब्राह्मïण के भेष में उसके पास पहुंचे। भगवान ने बर्बरीक की मन की बात जानने के लिए उससे पूछा कि तुम किसकी और से युद्घ लडऩे आए हो तब बर्बरीक ने कहा कि जो
कमजोर पक्ष होगा उसकी ओर से युद्ध में लडूंगा।
-भगवान ने बर्बरीक से कहा कि तुम तीन बाणों से सारी सेना को कैसे नष्टï कर सकते हो? तब बर्बरीक ने कहा कि सामने वाले पीपल वृक्ष के सभी पत्ते एक बाण से ही निशान हो जाए और दूसरा उसे बेध देगा।
-कृष्ण ने मुट्ठी व पैर के नीचे दो पत्ते छिपा लिए पर देखते ही एक बाण से क्षण भर में सब पत्ते बिंध गए तब श्री कृष्ण ने देखा वास्तव में यह एक ही बार में सबको यमलोक भेज सकता है।
-तब ब्राह्मïण बने श्रीकृष्ण ने बर्बरीक से याचना की तब बर्बरीक ने कहा हे! ब्राह्मïण क्या चाहते हो तब श्रीकृष्ण ने कहा कि क्या सबूत है जो मैं मांगूगा वह मुझे मिल जायेगा।
-तब बर्बरीक ने कहा जब वचन की बात की है तो तुम प्राण भी मांगोगे तो मिल जायेंगे। तो ब्राह्मïण के भेष में नटवर बोले मुझे तुम्हारा शीश का दान चाहिए।
-यह सुनकर बर्बरीक स्तब्ध रह गए और बोले मैं अपना वचन सहर्ष पूरा करूंगा पर सत्य कहो आप कौन हो तब कृष्ण ने अपना विराट स्वरूप बताते हुए कहा कि मैंने यह सोचा कि यदि तुम युद्घ में भाग लोगे तो दोनों कुल पूर्णतया नष्टï हो जाएंगे।
-तब बर्बरीक ने कहा कि आप मेरा शीश का दान तो ले लीजिए पर मेरी एक इच्छा है कि मैं युद्घ को आखिर तक देख सकूं। तब भगवान ने कहा कि तुम्हारी यह इच्छा पूरी होगी तब बर्बरीक ने अपना शीश धड़ से काटकर दे दिया।
-शीश को अमृत जडिय़ों के सहारे पहाड़ के ऊंचे शिखर पीपल वृक्ष पर स्थापित कर दिया। 18 दिन तक चले युद्घ में पाण्डवों को विजय प्राप्त हुई साथ ही उन्हें अपनी जीत पर घमण्ड हो गया, तब कृष्ण उन सबको लेकर वहां पहुंचे जहां बर्बरीक का सिर स्थापित था।
-बर्बरीक के सामने पाण्डव अपनी-अपनी वीरता का बखान करने लग गए। तब बर्बरीक के सिर ने कहा कि आप सबका घमण्ड करना व्यर्थ है। जीत श्री कृष्ण की नितिज्ञ से ही मिली है।
-मुझे तो इस युद्घ में श्री कृष्ण का सुदर्शन चक्र ही चलता नजर आया था इसके बाद बर्बरीक चुप हो गए और आकाश से फूलों की वर्षा होने लगी। तब भगवान कृष्ण ने प्रसन्न होकर बर्बरीक को वरदान दिया कि कलियुग में मेरे श्याम नाम से पूजे जाओगे और तुम्हारे सुमरण से सभी मनोरथ पूर्ण होंगे।

 

श्याम बाबा की आरती की समय-सारणी

पट खुलने का समय : प्रात: 5:00 बजे
मंगल आरती : प्रात: 5:30 बजे
शृंगार आरती : प्रात: 7:45 बजे
भोग आरती : दोपहर 12:30
पट बंद होने का समय : दोपहर 1 बजे
पट खुलने का समय : सायं 4:00 बजे
ग्वाला आरती : सायं 7:00 बजे
शयन आरती : रात्रि 9:15 बजे
मंदिर बंद होने का समय रात्रि 9:30 बजे
विशेष अवसर पर समय परिवर्तन भी हो सकता है।

आरती श्री खाटूश्यामजी कीॐ जय श्री श्याम हरे, बाबा जय श्री श्याम हरे।

खाटू धाम विराजत, अनुपम रूप धरे॥ ॐ जय॥

रतन जडि़त सिंहासन, सिर पर चंवर ढुरे।
तन केसरिया बागो, कुण्डल श्रवण पड़े॥ ॐ जय॥
गल पुष्पों की माला, सिर पर मुकुट धरे।
खेवत धूप अग्नि पर, दीपक ज्योति जले॥ ॐ जय॥
मोदक खीर चूरमा, सुवरण थाल भरे।
सेवक भोग लगावत, सेवा नित्य करे॥ ॐ जय॥
झांझ कटोरा और घडिय़ावल, शंख मृदंग धुरे।
भक्त आरती गावे, जय-जयकार करे॥ ॐ जय॥
जो ध्यावे फल पावे, सब दुख से उबरे।
सेवक जन निज मुख से, श्री श्याम-श्याम उचरे॥ ॐ जय॥
श्री श्याम बिहारी जी की आरती जो कोई नर गावे।
कहत आलूसिंह स्वामी, मनवांछित फल पावे॥ ॐ जय॥
तन मन धन सब कुछ है तेरा, हो बाबा सब कुछ है तेरा।
तेरा तुझको अर्पण, क्या लागे मेरा॥ ॐ जय॥
जय श्री श्याम हरे, बाबाजी श्री श्याम हरे।
निज भक्तों के तुमने, पूरण काज करे॥ ॐजय॥

बाबा खाटू श्याम कौन हैं? जानें उनके बारे में सबकुछ

बाबा खाटू श्याम का संबंध महाभारत काल से माना जाता है.माना जाता है कि खाटू श्याम पांडव पुत्र भीम के पौत्र थे.खाटू श्याम का असली नाम बर्बरीक था. खाटू श्याम जी भगवान श्री कृष्ण के कलयुगी अवतार हैं.

Baba Khatu Shyam Ji Birthday: आज देवउठनी एकादशी (Devuthani Ekadashi) वाले दिन बाबा खाटू श्याम जी (Baba Khatu Shyam Ji) का जन्मदिन है. बाबा खाटू श्याम का संबंध महाभारत काल से माना जाता है.  माना जाता है कि खाटू श्याम पांडव पुत्र भीम के पौत्र थे.खाटू श्याम का असली नाम बर्बरीक था. मान्यता है कि, खाटू श्याम की अपार शक्ति और क्षमता से प्रभावित होकर और खाटू श्याम (बर्बरीक) के शीश के दान से खुश होकर श्रीकृष्ण ने बर्बरीक को वरदान दिया कि तुम कलयुग में बाबा श्याम के नाम से पूजे जाओगे. वरदान देने के बाद उनका शीश खाटू नगर राजस्थान राज्य के सीकर जिले में दफनाया गया था जिन्हें अब बाबा खाटू श्याम कहा जाता है.

कौन हैं खाटू श्याम जी (Who is Khatu Shyam ji)

मान्यता है कि खाटू श्याम जी भगवान श्री कृष्ण के कलयुगी अवतार हैं. महाभारत में भीम के पुत्र का नाम घटोत्कच था और उसके पुत्र का नाम बर्बरीक था. बर्बरीक की माता का नाम हिडिम्बा था. आज के समय में बर्बरीक को ही बाबा खाटू श्याम जी के नाम से जाना जाता है.

खाटू श्याम की कहानी (Khatu Shyam Ji ki Kahani)

बर्बरीक का संबंध महाभारत काल से माना जाता है. माना जाता है कि वनवास के दौरान जब पांडव अपनी जान बचाते हुए भटक रहे थे, तब भीम हिडिम्बा नामक राक्षसी से मिले थे. हिडिम्बा और भीम का एक पुत्र हुआ जिसका नाम था घटोत्कच और घटोत्कच का पुत्र था बर्बरीक पुत्र हुआ. इन दोनों को उनकी वीरता और शक्तियों के लिए जाना जाता था.जब कौरव और पांडवों के बीच युद्ध होना था, तब बर्बरीक ने युद्ध देखने का निर्णय किया था.

भगवान श्रीकृष्ण ने जब उनसे पूछा कि वो युद्ध में किसकी तरफ से हैं, तो उन्होंने कहा था कि जो पक्ष हारेगा वो उसकी ओर से ही लड़ेंगे. भगवान श्रीकृष्ण युद्ध का परिणाम जानते थे और उन्हें डर था कि कहीं पांडवों के लिए उल्टा न पड़ जाए.ऐसे में भगवान श्रीकृष्ण ने बर्बरीक को रोकने के लिए उससे दान मांगा. और दान में उन्होंने बर्बरीक से उसका शीश मांग लिया.बर्बरीक ने भी खुशी से दान में अपना शीश दे दिया.

लेकिन उसने भगवान श्री कृष्ण से अंत तक युद्ध देखने की इच्छा जाहिर की. श्री कृष्ण ने भी उसकी ये इच्छा पूरी करने की बात पर हां बोल दिया और उनका सिर एक ऐसी पहाड़ी पर रख दिया जहां से पूरा युद्ध देखा जा सके. युद्ध जीतने के बाद पांडवों ने सवाल किया युद्ध की जीत का श्रेय किसे जाता है? तब बर्बरीक ने कहा कि उन्हें जीत श्रेय भगवान श्रीकृष्ण को देना चाहिए. भगवान श्रीकृष्ण बर्बरीक के इस जवाब और उसके बलिदान से प्रसन्न हुए और उन्हें कलयुग में खाटू श्याम के नाम से पूजे जाने का वरदान दे दिया.

क्यों प्रसिद्ध है बाबा खाटू श्याम का मंदिर (Khatu Shyam Ji Temple)

राजस्थान के सीकर जिले में श्री खाटू श्याम जी का भव्य मंदिर स्थापित है. खाटू श्याम मंदिर को बेहद महत्वपूर्ण मंदिरों में से एक माना जाता है. भगवान श्री कृष्ण बर्बरीक के बलिदान को देखकर काफी प्रसत्र हुए थे और उन्हें वरदान दिया था कि कलियुग में वे श्याम के नाम से पूजे जाएंगे. मान्यता है कि जो भी भक्त यदि सच्चे भाव से खाटू श्याम का नाम उच्चारण करता है, तो उसका उद्धार संभव है.

(Disclaimer: यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. ओपोई इसकी पुष्टि नहीं करता है.)

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